कुछ ख़्वाब देखे थे कभी मैंने खुली हुई आँखों से ,
बह रहे हैं मेरी आँखों से अब आँसू बनकर।
तिनका-तिनका जोड़ कर बनाया था आशियाँ जिनके लिए ,
वो मेरे अपने ही आते हैं मेरे पास अब मेहमाँ बनकर।
चाहता है मेरा दिल रहना दूर सबसे बस अपने में ही गुम और तनहा ,
नहीं भूलती हैं यादें जो साथ हैं मेरे साया बनकर।
ज़िन्दगी क्या कहूँ और कैसे करूँ शिक़वा-शिकायत भी कोई ,
मेरा नसीब रह गया है तेरे हाथों में खिलौना बनकर।
काली रात की तरहा घिर आया है उदासी का अंधेरा गहरा ,
घबराया हुआ दिल चाहता है कोई आये उम्मीद की सुबहा बनकर।
सुनीताशर्मादुबे
11June 2013
11June 2013
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