Saturday, 5 December 2015

Hasrat

जो चाहा वो पाया नहीं ,
जो पाया वो कभी चाहा नहीं ,
एक कश्मकश सी बनी रही ,
ज़िन्दगी में चाहत को पाने की।
वक़्त के साथ बीत गई ज़िन्दगी ,
या ज़िन्दगी जीते-जीते वक़्त निकल गया ,
बस एक ख़्वाहिश दबी रह गई सीने में ,
बेलौस हो के ज़िन्दगी को जीने की।
साँसों के चलने को कहते हैं अगर जीना ,
तो बख़ुदा अभी जी रहे हैं हम ,
पलकों में आँसू के समन्दर को छुपाकर ,
होंठ करते हैं साज़िश मुस्कुराने की।


सुनीताशर्मादुबे
2 -11 -2013

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