Friday, 15 May 2020


कुछ ख़्वाब देखे थे हमने खुली हुई आँखों से 
बह रहे हैं वही अब इन आँखों से आँसू बनकर

दिल चाहता है रहना सबसे दूर बस अपने में गुम और तन्हा
पीछा छोड़ती नहीं यादें आज भी साथ हैं मेरे साया बनकर 

जोड़कर तिनका-तिनका एक आशियाना बनाया जिनके लिये
वही अपने मेरे अब रहते हैं यहाँ मेहमान बनकर

उदासी का गहरा अंधेरा घिर आया है काली रात की तरहा
दिल चाहता है आये कोई उम्मीद की सुबहा बनकर

तुझसे क्या कहूँ और क्या शिकवा करूँ ऐ ज़िंदगी 
मेरा नसीब रह गया है तेरे हाथों में खिलौना बनकर

सुनीताशर्मादुबे
११-०६-२०१३
१.५४ मिनट दोपहर


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