Monday, 9 July 2018

थकने लगे हैं हाथ
घिस गया है क़लम भी
फिर भी बाक़ी हैं कुछ पन्ने
ज़िन्दगी की किताब में
काश कुछ ऐसा हो जाये
कि धुल जाये सियाही
हर लफ़्ज़ की हर पन्ने से
ताकि लिख सकूँ
फिर नई इबारत इसमें.....


सुनीताशर्मादुबे
09-07-2018

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